सोनम वांगचुक आंदोलन को लेकर देश में एक नई सियासी बहस छिड़ गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि राहुल गांधी के समर्थन के बाद से ही इस स्थानीय जनआंदोलन का तेजी से ‘कांग्रेसीकरण’ और राजनीतिकरण हो चुका है।
लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर प्रसिद्ध पर्यावरणविद सोनम वांगचुक अनशन और पदयात्रा कर रहे हैं। हालांकि, हालिया घटनाक्रमों और सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) जैसे संगठनों की दखलअंदाजी के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या मूल मांगों को पीछे धकेल कर राजनीतिक एजेंडा सेट किया जा रहा है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जैसा कि वॉइस ऑफ मैनपुरी की विशेष रिपोर्ट में भी रेखांकित किया गया है, कांग्रेस और सहयोगी दल इस जमीनी आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
राहुल गांधी की एंट्री से कैसे बदला आंदोलन का स्वरूप?
विशेषज्ञों ने इस आंदोलन के बदले स्वरूप के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारणों को चिन्हित किया है:
- राष्ट्रीय मंच पर जुड़ाव: राहुल गांधी द्वारा अपनी लद्दाख यात्रा के दौरान सोनम वांगचुक के मुद्दों को उठाने से आंदोलन को राष्ट्रीय कवरेज तो मिला, लेकिन इस पर ‘कांग्रेसी मोहर’ भी लग गई।
- एनजीओ और बाहरी संगठनों का हस्तक्षेप: CJP जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय संगठनों के जुड़ने के बाद स्थानीय लद्दाखी नेताओं के बीच असंतोष गहराने लगा है।
- चुनावी नैरेटिव: विशुद्ध रूप से क्षेत्र और पर्यावरण की रक्षा के लिए शुरू हुए इस सत्याग्रह का इस्तेमाल अब चुनावी माहौल बनाने के लिए किया जा रहा है।
क्या वांगचुक बचा पाएंगे आंदोलन की मूल आत्मा?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि जब कोई जनआंदोलन दलगत राजनीति की भेंट चढ़ता है, तो उसकी विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। सोनम वांगचुक के अहिंसक सत्याग्रह को अब राजनीतिक खींचतान से बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि लद्दाख की जनता इस राजनीतिक बदलाव को किस तरह स्वीकार करती है।
(Image Credit: abplive.com)






