भारतीय राजनीति में परिवारवाद और सियासी विरासत की जंग अब नए मोड़ पर है। अपनों के आपसी टकराव ने कई दलों के सामने साख और नेतृत्व का बड़ा संकट खड़ा किया है।
लोकतंत्र में जब योग्यता और जनसेवा के बजाय पारिवारिक प्राथमिकताओं को तरजीह दी जाती है, तब अक्सर आंतरिक कलह सामने आती है। हाल के वर्षों में देश के कई बड़े क्षेत्रीय दलों के भीतर उत्तराधिकार को लेकर मचे घमासान ने यह साबित किया है कि सियासत में रिश्ते कितनी जल्दी समीकरणों की भेंट चढ़ जाते हैं।
मायावती से लेकर पवार-ठाकरे तक: विरासत की पेचीदा जंग
हालिया घटनाक्रमों पर नजर डालें तो बहुजन समाज पार्टी में मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के बीच के फैसलों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया। पार्टी की कमान और रणनीतिक दिशा को लेकर उठे सवालों के बीच यह स्पष्ट हुआ कि क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व का संतुलन साधना कितना चुनौतीपूर्ण होता है।
वॉइस ऑफ मैनपुरी के राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक, यह स्थिति केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र की सियासत में शरद पवार बनाम अजित पवार और उद्धव ठाकरे बनाम राज ठाकरे (तथा बाद में शिवसेना का विभाजन) की घटनाओं ने यह दिखाया कि जब सत्ता की महत्वाकांक्षा टकराती है, तो दशकों पुराने पारिवारिक रिश्ते पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।
बिहार की सियासत: पासवान और यादव परिवार की रार
बिहार में भी ऐसी ही सियासी खींचतान लगातार देखने को मिली है। रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) में चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति कुमार पारस के बीच वर्चस्व की सीधी लड़ाई सामने आई। इसी तरह, राष्ट्रीय जनता दल में भी लालू प्रसाद यादव की विरासत को लेकर तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव के बीच समय-समय पर मतभेद उभरते रहे हैं।
- बसपा: संगठन विस्तार और रणनीतिक परिपक्वता को लेकर आकाश आनंद पर लिए गए कड़े फैसले।
- राकांपा (NCP): चाचा शरद पवार की छत्रछाया से निकलकर अजित पवार द्वारा अलग राह चुनना।
- लोजपा: पारिवारिक विभाजन के बाद जनाधार की जंग में जनता द्वारा नए नेतृत्व पर भरोसा।
- सपा: उत्तर प्रदेश में पूर्व में देखने को मिला ‘चाचा-भतीजा’ शक्ति संतुलन का लंबा दौर।
पारिवारिक द्वंद्व बनाम विकास की राजनीति
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आज का जागरूक मतदाता केवल उपनाम या विरासत के आधार पर वोट देने के बजाय पारदर्शी शासन, जनकल्याण और विकास को प्राथमिकता दे रहा है। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही योग्यता आधारित एवं परिणामोन्मुखी योजनाओं के प्रति जनता का विश्वास लगातार बढ़ रहा है।
विपक्ष के भीतर जारी यह खींचतान जहां उनकी अंदरूनी सांगठनिक चुनौतियों को दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर विकास केंद्रित प्रशासन यह संदेश देने में सफल रहा है कि नीतियों का केंद्रबिंदु केवल आम नागरिक होना चाहिए, न कि किसी एक कुनबे का राजनीतिक भविष्य।
(Image Credit: abplive.com)





