US Greenland Takeover Controversy Explained अमेरिका और ग्रीनलैंड के संबंधों को लेकर दुनिया के राजनीति, रक्षा और भू-रणनीति विशेषज्ञ अभी एक ऐसे विवाद की ओर देख रहे हैं, जिसका असर महाद्वीपों की शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है. इस विवाद के केंद्र में है ग्रीनलैंड, डेनमार्क का सेमी-स्वायत्त क्षेत्र और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक तौर पर अमेरिका के नियंत्रण में आने योग्य बताया है — चाहे यह ग्रीनलैंड के निवासियों की इच्छा हो या नहीं.

ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक महत्व
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के बीच स्थित है, जहाँ 20वीं सदी की शुरुआत से ठंडे युद्ध और आधुनिक रक्षा रणनीतियों का भारी प्रभाव रहा है. यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि:
- आर्कटिक के पिघलते समुद्री मार्ग अब वैश्विक व्यापार और नौवहन के लिए खुल रहे हैं।
- यहाँ प्राकृतिक संसाधन जैसे दुर्लभ पृथ्वी खनिज (rare earth minerals), गैस और तेल के विशाल संभावित भंडार हैं, जो भविष्य की ऊर्जा और टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी हैं।
- पृथ्वी की उत्तरी सीमाओं पर नियंत्रण रखने वाले देशों को वैश्विक सैन्य और खुफिया लाभ मिलता है।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड में अमेरिकी पिटुफिक स्पेस बेस जैसी सुविधाएँ पहले से मौजूद हैं, जो मिसाइल रक्षा और उपग्रह निगरानी के लिए महत्वपूर्ण हैं.
ट्रम्प की घोषणा: “हम इसे लेंगे — चाहे वे पसंद करें या नहीं”
9 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से दी गई एक घोषणा में पेरू के खिलाफ नई विदेश नीति के बीच, ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड “स्वामित्व में लेना चाहिए” ताकि रूस और चीन जैसे देशों को वहां प्रभाव स्थापित करने से रोका जा सके.
ट्रम्प के अनुसार, अमेरिका के पास ग्रीनलैंड को हासिल करने के कई विकल्प हो सकते हैं:
- खरीद के लिए बातचीत
- वित्तीय सहयोग के साथ स्थानीय समर्थन प्राप्त करना
- सैन्य बल का विकल्प (केवल जरूरत पड़ने पर)
(व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने स्वीकार किया है कि सैन्य विकल्प मौजूद है, लेकिन इसे प्राथमिक नहीं बताया गया.)
ट्रम्प के सहयोगियों ने यह भी घोषणा की कि प्रति ग्रीनलैंड निवासी को भारी वित्तीय प्रोत्साहन दिया जा सकता है ताकि वे स्वेच्छा से अमेरिका के साथ जुड़ने के पक्ष में मतदान करें.
ग्रीनलैंड और डेनमार्क की कड़ी प्रतिक्रिया
ट्रम्प के बयान पर ग्रीनलैंड के राजनीतिक नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे अमेरिकी नागरिक नहीं बनना चाहते. उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड का भविष्य सिर्फ़ वहां के जनता द्वारा ही तय होना चाहिए और कोई भी बाहरी दबाव स्वीकार्य नहीं है.
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका सैन्य रूप से ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश करेगा, तो इससे नाटो (NATO) गठबंधन के अस्तित्व को गंभीर खतरा होगा क्योंकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड सीधा नाटो सदस्य हैं.
यूरोप और नाटो की प्रतिक्रिया
यूरोपीय देशों, खासकर इटली और अन्य नाटो सहयोगियों ने इस विवाद पर संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप किसी भी निर्णय पर ही आगे बढ़ना चाहिए.
इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने स्पष्ट किया कि वे किसी सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन नहीं करतीं, बल्कि आर्कटिक में नाटो की भूमिका को मजबूत करने की वकालत कर रही हैं ताकि वैश्विक शक्ति संतुलन बनाए रखा जा सके।
लोकप्रिय मत: ग्रीनलैंड के लोग क्या चाहते हैं?
2025 और 2026 के विभिन्न सर्वेक्षणों और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 85% ग्रीनलैंड निवासी अमेरिका के साथ मिलने के विचार का विरोध करते हैं और वे अपनी सांस्कृतिक पहचान तथा राजनीतिक स्वायत्तता बचाए रखना चाहते हैं. (Wikipedia)
ग्रीनलैंड के प्रमुख नेताओं ने कई बार स्पष्ट कहा है कि इस निर्णय को केवल उन्हें ही सूचित करना चाहिए, न कि किसी बाहरी शक्ति को.
क्या अमेरिका वाकई ग्रीनलैंड ले सकता है?
कई विशेषज्ञ इस पर मतभेद रखते हैं:
- कुछ का कहना है कि खरीद-बिक्री या बातचीत के रास्ते से ही कुछ बदल सकता है, अगर वहां की जनता और डेनमार्क दोनों राज़ी हों.
- कुछ का मानना है कि सैन्य कार्रवाई नाटो के नियमों का उल्लंघन होगा और विश्व राजनीति में भारी उलटफेर कर देगा.
- कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ग्रीनलैंड की दुर्लभ खनिज संपदा और सामरिक स्थान के कारण इस विवाद के पीछे सिर्फ रक्षा ही नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ भी प्रमुख है।
इतिहास का महत्व
यह कोई नई बात नहीं है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में दिलचस्पी रखता है. यहां तक कि 1946 में ट्रूमैन प्रशासन ने डेनमार्क को 100 मिलियन डॉलर में ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे डेनमार्क ने अस्वीकार कर दिया था.
1951 से डेनमार्क और अमेरिका के बीच रक्षा समझौता मौजूद है, जिसके तहत अमेरिकी बलों को ग्रीनलैंड में मिलिटरी बेस की अनुमति है, लेकिन यह संधि sovereignty को नहीं बदलती.
क्या आगे क्या होगा?
वर्तमान में संयुक्त बयान, कूटनीतिक बातचीत और वैश्विक प्रतिक्रिया जारी है. यूरोप और नाटो सहयोगी ग्रीनलैंड की संप्रभुता को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि अमेरिका इसके लिए अपने रणनीतिक हितों को स्पष्ट कर रहा है.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस विवाद का समाधान राजनीतिक वार्ता, स्थानीय समर्थन और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मिलित प्रयास से ही निकलेगा, न कि एकतरफा सैन्य कार्रवाई से.
ग्रीनलैंड विवाद सिर्फ़ एक भू-राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संसाधन, अंतरराष्ट्रीय सम्मान और लोकतांत्रिक निर्णय जैसे विविध मुद्दों का सम्मिश्रण है, जिसमें अमेरिका, डेनमार्क, ग्रीनलैंड और यूरोपीय सहयोगी सभी शामिल हैं. जैसे-जैसे यह कहानी आगे बढ़ेगी, वैश्विक राजनीति की दिशा पर भी इसके गहरे असर दिखेंगे



