विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सहायता पर नीति बनाए केंद्र सरकार: मद्रास हाईकोर्ट

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राजधर्म पर कौटिल्य और मनु के विचारों का दिया हवाला

मद्रास उच्च न्यायालय की इमारत
मद्रास उच्च न्यायालय की इमारत

मद्रास उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों (NRI/OCI/प्रवासी भारतीय) की सहायता, संरक्षण और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए एक समग्र एवं स्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि राज्य का यह नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि वह अपने नागरिकों की सहायता करे, चाहे वे देश की सीमाओं के भीतर हों या विदेशों में निवास कर रहे हों।

अदालत ने इस संदर्भ में राजधर्म की अवधारणा पर विस्तार से टिप्पणी करते हुए प्राचीन भारतीय चिंतकों कौटिल्य (अर्थशास्त्र) और मनु (मनुस्मृति) के विचारों का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि भारतीय शासन परंपरा में शासक का कर्तव्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि संकट में पड़े नागरिकों की रक्षा और सहायता करना भी रहा है।


अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

न्यायालय ने कहा कि आज के वैश्विक युग में लाखों भारतीय रोजगार, शिक्षा, व्यापार और पारिवारिक कारणों से विदेशों में रह रहे हैं। ऐसे में उन्हें अक्सर निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है:

  • रोजगार से जुड़े शोषण के मामले
  • वीज़ा और आव्रजन से संबंधित जटिलताएं
  • कानूनी सहायता की कमी
  • युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता या प्राकृतिक आपदाओं के समय असुरक्षा
  • मानवाधिकार उल्लंघन के मामले

अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में केवल तदर्थ (ad-hoc) व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि एक संस्थागत, पारदर्शी और उत्तरदायी नीति ढांचा आवश्यक है।


राजधर्म और भारतीय दर्शन का उल्लेख

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय परंपरा में राजधर्म का अर्थ है—राज्य द्वारा सभी नागरिकों के प्रति समान न्याय और संरक्षण।

  • कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा के सुख-दुख को अपना सुख-दुख माने।
  • मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि शासक को अपने नागरिकों की रक्षा करनी चाहिए, विशेषकर तब जब वे संकट में हों और स्वयं अपनी सहायता करने की स्थिति में न हों।

अदालत ने टिप्पणी की कि आधुनिक संवैधानिक शासन में भी यह दर्शन उतना ही प्रासंगिक है।


केंद्र सरकार को क्या निर्देश

न्यायालय ने केंद्र सरकार से अपेक्षा की कि वह:

  1. विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए एकीकृत राष्ट्रीय नीति तैयार करे
  2. संकट की स्थिति में सहायता के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाए
  3. दूतावासों और उच्चायोगों की भूमिका को और सशक्त करे
  4. कानूनी, आर्थिक और मानवीय सहायता के तंत्र को संस्थागत रूप दे
  5. शिकायत निवारण के लिए प्रभावी और समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित करे

हालांकि अदालत ने नीति के स्वरूप को लेकर केंद्र को विवेकाधिकार दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि नीति का अभाव स्वीकार्य नहीं है


प्रवासी भारतीयों के लिए फैसले का महत्व

यह निर्णय विदेशों में रहने वाले करोड़ों भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि केंद्र सरकार इस निर्देश के अनुरूप नीति बनाती है, तो इससे:

  • संकटग्रस्त भारतीयों को समय पर सहायता मिलेगी
  • दूतावासों की जवाबदेही बढ़ेगी
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की नागरिक-केंद्रित छवि मजबूत होगी

संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी

अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान का मूल भाव नागरिकों के सम्मान और संरक्षण पर आधारित है। राज्य की जिम्मेदारी केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हो सकती, विशेषकर तब जब नागरिकता का संबंध बना हुआ हो।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण के इस दौर में शासन को अपनी नीतियों को बदलती सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना होगा।

मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्देश न केवल कानूनी दृष्टि से, बल्कि नैतिक और दार्शनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। कौटिल्य और मनु के विचारों का संदर्भ देते हुए अदालत ने यह रेखांकित किया है कि राजधर्म आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन भारत में था। अब यह केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस निर्देश को किस प्रकार व्यवहार में लाती है।

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मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सहायता के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने राजधर्म पर कौटिल्य और मनु के विचारों का हवाला दिया।

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