मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) पर विपक्ष के भ्रामक दावों पर पलटवार करते हुए भाजपा ने स्पष्ट किया कि पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने विरोधियों के आरोपों को तथ्यहीन राजनीतिक विमर्श करार दिया है।
नई दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने विपक्ष द्वारा 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने तार्किक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि यदि इतने बड़े पैमाने पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए गए होते, तो देश की जागरूक जनता सड़कों पर उतर चुकी होती। लोकतांत्रिक संस्थाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग पूरी निष्पक्षता और तकनीक-आधारित व्यवस्था के तहत काम कर रहा है।
कांग्रेस के कार्यकाल में 10 बार हुआ विशेष पुनरीक्षण
वॉइस ऑफ मैनपुरी की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, संबित पात्रा ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए याद दिलाया कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कोई नई व्यवस्था नहीं है। यह एक सतत प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसे कांग्रेस सरकारों के दौर में भी कम से कम 10 बार संपन्न कराया गया था ताकि मतदाता सूची से फर्जी या मृत मतदाताओं के नाम हटाकर उसे सटीक बनाया जा सके।
पात्रा ने कहा कि जब यही प्रक्रिया पूर्ववर्ती सरकारों के समय होती थी तब इसे चुनावी सुधार माना जाता था, लेकिन आज जब वर्तमान व्यवस्था अधिक तकनीकी और पारदर्शी तरीके से मतदाता सूचियों को सुदृढ़ कर रही है, तो हताश विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं की साख पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास कर रहा है।
संबित पात्रा द्वारा रखे गए प्रमुख बिंदु:
- प्रशासनिक निरंतरता: मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण (SIR) एक सामान्य और अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसे कांग्रेस शासनकाल में भी 10 बार दोहराया गया था।
- पारदर्शिता पर बल: वर्तमान सरकार चुनाव प्रणाली को डिजिटल, निष्पक्ष और आधुनिक बनाने के प्रयासों में निर्वाचन आयोग का पूरा सहयोग कर रही है।
- आधारहीन राजनीतिक आरोप: 13 करोड़ वोट कटने का दावा केवल चुनावी विमर्श भटकाने के लिए गढ़ा गया एक अवास्तविक नैरेटिव है।
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का भरोसा: देश का प्रबुद्ध नागरिक चुनावी व्यवस्था और डिजिटलीकरण की इस व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास रखता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि आधुनिक भारत में चुनाव प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक पारदर्शी और सुगम बनी है। ऐसे में चुनावी सुधारों और मतदाता सूची के तकनीकी नवीनीकरण को राजनीतिक रंग देने के बजाय संस्थागत सुधारों को सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए।
(Image Credit: abplive.com)






