शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश): होली का त्योहार देशभर में रंग, गुलाल और उल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के Shahjahanpur में मनाई जाने वाली ‘जूता मार होली’ अपनी अनोखी परंपरा के कारण अलग पहचान रखती है। सदियों पुरानी इस परंपरा में लोग एक व्यक्ति पर जूते-चप्पल फेंकते हैं, जो ब्रिटिश काल के ‘लाट साहब’ के रूप में सजा होता है।
यह परंपरा न केवल हास्य और व्यंग्य का प्रतीक है, बल्कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनता के आक्रोश और प्रतिरोध की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति भी मानी जाती है।


क्या है ‘जूता मार होली’ की परंपरा?
‘जूता मार होली’ में एक व्यक्ति को ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारी ‘लाट साहब’ की वेशभूषा में सजाया जाता है। उसके साथ एक जुलूस निकाला जाता है, जिसमें स्थानीय लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
जुलूस के दौरान लोग ‘लाट साहब’ पर जूते-चप्पल फेंकते हैं। हालांकि यह सब पूरी तरह प्रतीकात्मक और नियंत्रित तरीके से किया जाता है। सुरक्षा और मर्यादा का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि किसी को चोट न पहुंचे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा अंग्रेजी शासन के दौरान शुरू हुई थी, जब आम जनता के भीतर ब्रिटिश अधिकारियों के प्रति असंतोष था। प्रत्यक्ष विरोध संभव नहीं था, इसलिए इस तरह के सांकेतिक आयोजनों के माध्यम से भावनाएं व्यक्त की जाती थीं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इतिहासकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में होली के दौरान सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य की परंपरा रही है। शाहजहांपुर की ‘जूता मार होली’ भी उसी कड़ी का हिस्सा है।
ब्रिटिश काल में ‘लाट साहब’ शब्द उच्च अधिकारियों के लिए प्रयोग होता था। होली के दिन आम लोग इस रूपक के जरिए सत्ता के प्रतीक पर व्यंग्य करते थे।
आजादी के बाद भी यह परंपरा जारी रही और धीरे-धीरे यह स्थानीय सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई।
आयोजन की प्रक्रिया
होली के दिन सुबह से ही शहर में उत्सव का माहौल रहता है। दोपहर के समय ‘लाट साहब’ की सवारी निकाली जाती है। ढोल-नगाड़ों और रंग-गुलाल के बीच जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरता है।
जुलूस के दौरान लोग हंसी-मजाक और नारेबाजी के साथ जूते फेंकते हैं। आयोजन समिति पहले से तय करती है कि यह कार्यक्रम किस स्थान पर और कितनी देर चलेगा।
प्रशासन भी सुरक्षा व्यवस्था के लिए तैनात रहता है, ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।
सांस्कृतिक महत्व
‘जूता मार होली’ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति का जीवंत उदाहरण है। यह परंपरा बताती है कि कैसे त्योहारों के माध्यम से समाज अपनी भावनाएं और इतिहास को अभिव्यक्त करता है।
होली स्वयं सामाजिक बंधनों को तोड़ने और व्यंग्य-उल्लास का पर्व माना जाता है। शाहजहांपुर की यह परंपरा उसी भावना का विस्तार है, जहां सत्ता के प्रतीक पर हास्य के माध्यम से प्रहार किया जाता है।
स्थानीय लोग इसे अपनी विरासत मानते हैं और हर वर्ष बड़ी संख्या में इसमें भाग लेते हैं।
प्रशासन और सामाजिक समन्वय
हाल के वर्षों में प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि आयोजन शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हो।
धार्मिक और सामाजिक समन्वय बनाए रखने के लिए स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ पहले से बैठकें की जाती हैं। आयोजन समिति और पुलिस मिलकर मार्ग, समय और सुरक्षा के इंतजाम तय करते हैं।
इसका उद्देश्य यह है कि परंपरा भी बनी रहे और कानून-व्यवस्था भी प्रभावित न हो।
पर्यटन और पहचान
‘जूता मार होली’ ने शाहजहांपुर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। हर साल आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से लोग इस अनोखी होली को देखने पहुंचते हैं।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भी यह परंपरा चर्चा में रहती है, जिससे स्थानीय पर्यटन और व्यापार को लाभ मिलता है।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की ‘जूता मार होली’ सदियों पुरानी परंपरा है, जो इतिहास, व्यंग्य और लोक-संस्कृति का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है।
यह आयोजन दर्शाता है कि भारतीय त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक अभिव्यक्ति के माध्यम भी हैं। बदलते समय में भी यह परंपरा जीवित है और हर वर्ष नए उत्साह के साथ मनाई जाती है।



