SIR विवाद: ममता बनर्जी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग को नोटिस—सीएम ने खुद रखी दलील
नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी और संवैधानिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बुधवार को भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस पूरे मामले का “प्रैक्टिकल समाधान” तलाशा जाएगा। अगली सुनवाई सोमवार को तय की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ—जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी.एम. पंचोली भी शामिल थे—ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि कथित “लॉजिकल गड़बड़ियों” के आधार पर मतदाताओं को नोटिस भेजते समय अत्यधिक सावधानी बरती जाए। पीठ ने यह भी कहा कि “जो असली मतदाता हैं, उनका अधिकार कोई नहीं छीन सकता।”

क्या है SIR और विवाद की जड़?
राज्य में चल रहे SIR अभ्यास के तहत मतदाता सूची की व्यापक जांच की जा रही है। आयोग का दावा है कि इसका उद्देश्य डुप्लीकेट या त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियों को हटाकर सूची को अधिक पारदर्शी बनाना है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस और खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि यह प्रक्रिया भेदभावपूर्ण बनती जा रही है और इससे लाखों वास्तविक मतदाता प्रभावित हो सकते हैं।
सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान—जो ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए—ने कोर्ट को बताया कि वोटर लिस्ट के फाइनल प्रकाशन में महज़ 11 दिन बचे हैं, जबकि सुनवाई पूरी करने के लिए केवल चार दिन उपलब्ध हैं। उन्होंने दावा किया कि लगभग 70 लाख लोगों को नाम में मामूली स्पेलिंग मिसमैच के चलते नोटिस भेजे गए हैं। उनका तर्क था कि ऐसे छोटे-छोटे अंतर (जैसे सरनेम, मध्य नाम या वर्तनी) के आधार पर नोटिस जारी करना उचित नहीं है और इन्हें तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।

दस्तावेज़ों की अस्वीकृति और माइक्रो ऑब्ज़र्वर पर सवाल
श्याम दीवान ने यह भी आरोप लगाया कि करीब 8,300 माइक्रो ऑब्ज़र्वर तैनात किए गए हैं, जिनका संविधान में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट, आधार कार्ड और ओबीसी सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेज़ों को कई मामलों में स्वीकार नहीं किया जा रहा, जबकि आम लोग 4–5 घंटे तक लंबी कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं।
उनका यह भी कहना था कि जिन मतदाताओं को “गड़बड़ी वाली कैटेगरी” में रखा गया है, उनके नाम हटाने या नोटिस जारी करने का ठोस कारण आयोग ने सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया। इससे प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान पीठ ने दो टूक कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद मताधिकार है और किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया से वास्तविक मतदाता वंचित नहीं होने चाहिए। अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी अपेक्षा जताई कि नोटिस जारी करने से पहले तथ्यों की दोबारा जांच हो और नागरिकों को पर्याप्त अवसर दिया जाए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम जिम्मेदारी से नहीं भागेंगे। हम समाधान निकालेंगे।” इस टिप्पणी को संवैधानिक संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
जब मुख्यमंत्री खुद खड़ी हुईं बेंच के सामने
इस सुनवाई की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहीं और बहस के दौरान बेंच के सामने खड़ी होकर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा, “मैं साधारण परिवार से हूं। मैं बहुत महत्वपूर्ण नहीं हूं, लेकिन मैं सभी के लिए लड़ रही हूं।”
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि SIR के चलते सामाजिक भेदभाव पैदा हो रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद जिन महिलाओं ने पति का सरनेम अपनाया है, उनके नाम सूची से काटे जा रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि बंगाल को “टारगेट” किया जा रहा है और इस पूरी कवायद का असर ज़मीनी स्तर पर बेहद गंभीर है।
सीएम ने यह आरोप भी लगाया कि 100 से अधिक लोगों की मौत हुई है और कई बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) ने आत्महत्या तक कर ली—हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।
राजनीतिक और सामाजिक असर
इस पूरे प्रकरण ने बंगाल की राजनीति को गरमा दिया है। विपक्ष इसे प्रशासनिक सुधार बता रहा है, जबकि सत्तारूढ़ दल इसे मतदाताओं के अधिकारों पर हमला करार दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर SIR की प्रक्रिया में संतुलन और पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो यह आने वाले चुनावों की विश्वसनीयता पर भी असर डाल सकती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि यह प्रक्रिया समावेशी, संवेदनशील और निष्पक्ष हो। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा दखलअंदाजी इसी संतुलन को साधने की कोशिश मानी जा रही है।
आगे क्या?
अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है और सोमवार को अगली सुनवाई होगी। तब तक आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि नोटिस जारी करने का मापदंड क्या है, किन दस्तावेज़ों को वैध माना जा रहा है और मामूली नाम-संबंधी त्रुटियों से निपटने की नीति क्या होगी।
कानूनी जानकारों के अनुसार, अगली सुनवाई में कोर्ट अंतरिम दिशा-निर्देश भी जारी कर सकता है, ताकि फाइनल वोटर लिस्ट प्रकाशित होने से पहले नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
SIR विवाद अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है—यह संवैधानिक अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक न्याय से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन चुका है। ममता बनर्जी की व्यक्तिगत मौजूदगी और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में अदालत का रुख तय करेगा कि बंगाल में मतदाता सूची पुनरीक्षण किस दिशा में आगे बढ़ेगा—और क्या लाखों नागरिकों की चिंता को वास्तविक राहत मिल पाएगी।



