सुप्रीम कोर्ट ने उन्नाव दुष्कर्म मामले में कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ी राहत देने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक
दिल्ली:
उन्नाव दुष्कर्म मामले में दोषी करार दिए गए पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को लेकर एक बार फिर बड़ा न्यायिक घटनाक्रम सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें सेंगर को दी गई आजीवन कारावास की सजा को निलंबित कर दिया गया था। शीर्ष अदालत के इस कदम के बाद फिलहाल सेंगर को सजा निलंबन के आधार पर मिलने वाली राहत टल गई है और मामला फिर से न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गया है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक आदेश पारित कर सेंगर की सजा के निलंबन को मंजूरी दी थी। इस पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी कि इतने गंभीर और संवेदनशील मामले में सजा का निलंबन न्याय और पीड़िता—दोनों के लिए प्रतिकूल है। CBI की इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल आदेश पर रोक लगाई, बल्कि केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों के साथ-साथ कुलदीप सिंह सेंगर को भी नोटिस जारी किया है। अदालत ने सेंगर को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद ही मामले में आगे की सुनवाई की जाएगी। यह कदम इस बात का संकेत देता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को बेहद संवेदनशील और गंभीर दृष्टिकोण से देख रहा है।
ज्ञात रहे कि वर्ष 2017 में उन्नाव की एक नाबालिग पीड़िता ने सेंगर पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में तब आया जब पीड़िता और उसके परिवार पर कथित रूप से दबाव बनाने और केस वापस लेने के लिए लगातार दबाव डाला गया। बाद में सड़क दुर्घटना और अन्य घटनाओं ने मामले को और जटिल बना दिया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद दिल्ली की एक विशेष अदालत ने सेंगर को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाए जाने को कई कानूनी विशेषज्ञ न्याय व्यवस्था में भरोसा कायम रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में सजा का निलंबन न केवल पीड़ित पक्ष के मनोबल को प्रभावित कर सकता है, बल्कि समाज में भी गलत संदेश जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर, सेंगर की ओर से यह दलील दी जाती रही है कि वह निर्दोष हैं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीतिक और व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है, जिसके तहत वे चार सप्ताह के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करेंगे।
CBI की याचिका पर जारी नोटिस के बाद यह मामला पुनः चर्चा में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से अगले आदेश आने तक दिल्ली हाई कोर्ट का सजा निलंबन आदेश प्रभावी नहीं रहेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि सेंगर की सजा, यथास्थिति में, बरकरार रहेगी।
अब सभी की निगाहें आने वाली सुनवाई पर टिकी होंगी, जिसमें यह तय होगा कि आगे सेंगर की सजा के निलंबन पर क्या रुख अपनाया जाए। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि शीर्ष अदालत इस मामले के व्यापक सामाजिक प्रभाव, पीड़िता के अधिकारों और न्याय व्यवस्था की गरिमा को किस प्रकार संतुलित करती है।



