लखनऊ में तैयार हो रहा ‘सुपरसोनिक किला’: ब्रह्मोस एयरोस्पेस केंद्र से भारत की सैन्य शक्ति को नई धार

लखनऊ में तैयार हो रहा ‘सुपरसोनिक किला’: ब्रह्मोस एयरोस्पेस केंद्र से भारत की सैन्य शक्ति को नई धार

लखनऊ अनेक इतिहासों का साक्षी रहा है। नवाबों और कवियों की विरासत, 1857 के विद्रोह की गूंज और स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक हलचल—इन सबकी स्मृतियां आज भी शहर की फिजाओं में मौजूद हैं। अब इसी ऐतिहासिक धरती पर भारत की सामरिक ताकत का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। शहर के बाहरी इलाके में, लखनऊ-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप, 200 एकड़ में फैला ब्रह्मोस एयरोस्पेस इंटीग्रेशन और टेस्टिंग सेंटर न केवल एक औद्योगिक इकाई है, बल्कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर उभर रहा है।

यह कोई साधारण कारखाना नहीं, बल्कि एक ऐसी “भट्टी” है जहां भारत की सबसे शक्तिशाली पारंपरिक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल—ब्रह्मोस—का निर्माण, संयोजन और परीक्षण होता है। पास से बहती गंगा नदी, जो निरंतर दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है, मानो उस अजेय शक्ति की साक्षी है जो आज भारत के आकाश, समुद्र और धरती पर अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज करा रही है।

लखनऊ-कानपुर हाईवे के किनारे 200 एकड़ में फैला ब्रह्मोस एयरोस्पेस इंटीग्रेशन एवं टेस्टिंग सेंटर, जहां भारत की सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल का निर्माण और परीक्षण किया जा रहा है।

2018 से शुरू हुई रणनीतिक यात्रा

इस महत्वाकांक्षी परियोजना की नींव वर्ष 2018 में रखी गई, जब उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे (यूपीडीआईसी) के तहत लखनऊ क्षेत्र में 200 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया। यह निर्णय केवल औद्योगिक विकास तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे प्रदेश को राष्ट्रीय रक्षा उत्पादन के मानचित्र पर स्थापित करने की स्पष्ट रणनीति थी।

ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड (बीएपीएल), जो भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस की गैर-लाभकारी संस्था मशीनोस्ट्रोयेनिया का संयुक्त उद्यम है, पहले से ही हैदराबाद, तिरुवनंतपुरम, पिलानी और नागपुर में उत्पादन व सिस्टम इंटीग्रेशन इकाइयां संचालित कर रहा था। लेकिन बढ़ती मांग और नए ऑर्डरों के दबाव के चलते एक बड़े, अत्याधुनिक और केंद्रीकृत केंद्र की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। लखनऊ का चयन इसी आवश्यकता का परिणाम था।

बढ़ती सैन्य मांग और निर्यात की राह

बीते कुछ वर्षों में ब्रह्मोस मिसाइल की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। भारतीय नौसेना को जहाजों और पनडुब्बियों से लॉन्च की जाने वाली मिसाइलों की अतिरिक्त जरूरत है, जबकि भारतीय वायुसेना अपने Su-30MKI लड़ाकू विमानों में वायु-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों के एकीकरण की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा रही है। इसके साथ ही, भारतीय सेना को विस्तारित रेंज वाले जमीनी संस्करणों की आवश्यकता है, जिससे सीमाओं पर मारक क्षमता और प्रतिक्रिया समय में सुधार हो सके।

सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ब्रह्मोस अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं रहा। एशिया और अन्य क्षेत्रों के कई देशों से निर्यात संबंधी पूछताछ सामने आई हैं, जिनमें से कुछ ठोस अनुबंधों में तब्दील हो चुकी हैं। ऐसे में लखनऊ स्थित यह केंद्र भारत को एक प्रमुख रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित करने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

रोजगार, तकनीक और आत्मनिर्भर भारत

इस केंद्र की स्थापना से उत्तर प्रदेश में उच्च तकनीकी रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। इंजीनियरिंग, मेटलर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित युवाओं को सीधे लाभ मिल रहा है। इसके साथ ही, स्थानीय एमएसएमई इकाइयों को भी रक्षा उत्पादन श्रृंखला से जोड़ा जा रहा है, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सोच के अनुरूप यह परियोजना भारत की रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है। लखनऊ का ब्रह्मोस केंद्र न केवल मिसाइल निर्माण का स्थल है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक सोच, तकनीकी क्षमता और वैश्विक महत्वाकांक्षा का जीवंत उदाहरण भी है।

इतिहास से भविष्य की ओर

जिस लखनऊ ने कभी नवाबी तहजीब और साहित्य को आकार दिया, वही आज भारत की सामरिक शक्ति का आधार बन रहा है। यहां तैयार हो रही सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइलें देश की सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ भारत को वैश्विक रक्षा मानचित्र पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर रही हैं। इतिहास की गूंज के बीच भविष्य की यह तैयारी, लखनऊ को एक बार फिर राष्ट्रीय महत्व के केंद्र में ला खड़ा करती है।

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