पॉक्सो अदालत ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने के गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दोषी को 10 साल के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
प्रदेश में बेटियों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का असर अदालतों में भी स्पष्ट नजर आ रहा है। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए ठोस साक्ष्यों और प्रभावी पैरवी के चलते पॉक्सो की विशेष अदालत ने आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। वॉइस ऑफ मैनपुरी की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा महिला एवं बाल अपराधों पर त्वरित कानूनी कार्रवाई के निर्देश के बाद अब पुराने लंबित मामलों में भी दोषियों को तेजी से सजा दिलाई जा रही है।
अदालत का ऐतिहासिक फैसला और मुख्य बिंदु
विशेष अदालत के न्यायाधीश ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्पष्ट किया कि नाबालिगों के प्रति ऐसे अपराध समाज के लिए असहनीय हैं। अदालत द्वारा तय किए गए मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- 10 वर्ष का सश्रम कारावास: दोषी को भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत कठोर सजा।
- ₹1 लाख का आर्थिक दंड: अर्थदंड न चुकाने पर दोषी को अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
- पीड़िता के पुनर्वास पर बल: जुर्माने की राशि का एक हिस्सा पीड़िता को आर्थिक सहायता और संबल देने के लिए प्रयुक्त किया जाएगा।
अभियोजन की प्रभावी पैरवी से न्याय सुनिश्चित
यह मामला करीब छह वर्ष पुराना था, जिसमें आरोपी ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर अगवा कर लिया था। पुलिस प्रशासन ने निरंतर तत्परता दिखाते हुए विवेचना को वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ समय पर पूरा किया। सरकारी वकीलों की मुस्तैद दलीलों ने यह सुनिश्चित किया कि गवाहों के बयानों में कोई कमी न रहे।
कानून व्यवस्था के जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार की प्रभावी मॉनिटरिंग और ‘मिशन शक्ति’ जैसी पहलों से अभियोजन तंत्र बेहद मजबूत हुआ है। पुलिस और प्रशासन द्वारा की जा रही सख्त पैरवी यह संदेश देती है कि कानून से खिलवाड़ करने वाले तत्वों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
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