पॉक्सो कोर्ट ने नाबालिग के अपहरण मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दोषी को 10 साल की कठोर जेल और ₹1 लाख के अर्थदंड की बड़ी सजा सुनाई है।
महिला एवं बाल सुरक्षा को लेकर सरकार और न्यायपालिका की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का असर अब धरातल पर साफ दिखने लगा है। विशेष पॉक्सो अदालत ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगाने के गंभीर मामले में 6 साल बाद अंतिम फैसला सुनाते हुए आरोपी को सलाखों के पीछे भेज दिया है। वॉइस ऑफ मैनपुरी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने मजबूत साक्ष्य और गवाह पेश कर अदालत के समक्ष प्रभावी पैरवी की, जिसके चलते दोषी को किसी भी प्रकार की राहत नहीं मिल सकी।
प्रशासन की सशक्त पैरवी से मिला पीड़िता को न्याय
उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में महिला सुरक्षा के लिए गठित फास्ट-ट्रैक और विशेष पॉक्सो अदालतों के माध्यम से लंबित मामलों का तेजी से निपटारा किया जा रहा है। सरकार द्वारा अभियोजन तंत्र को मजबूत बनाने के प्रयासों का ही नतीजा है कि पुराने मामलों में भी दोषियों को कठोर दंड दिलाया जा रहा है।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि नाबालिगों के प्रति होने वाले अपराधों में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है। लगाए गए ₹1 लाख के जुर्माने में से अधिकांश राशि पीड़िता के पुनर्वास और मानसिक संबल के लिए दी जाएगी।
मामले से जुड़े मुख्य बिंदु:
- दोषी को सजा: अदालत ने अभियुक्त को 10 साल के कठोर कारावास की सजा से दंडित किया।
- आर्थिक दंड: दोषी पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया गया है, जिसे न भरने पर अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी।
- कानूनी कार्रवाई: पुलिस द्वारा एकत्र किए गए डिजिटल व फॉरेnsic साक्ष्यों ने केस को मजबूत बनाया।
- त्वरित न्याय नीति: विशेष न्यायालयों के सशक्त संचालन से महिला अपराधों पर अंकुश लगाने की दिशा में यह एक प्रभावी कदम साबित हुआ है।
यह फैसला अपराधियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि शासन और न्यायिक प्रणाली बालिकाओं की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह सजग और संकल्पबद्ध है। कानून-व्यवस्था की यह सक्रियता समाज में सुरक्षा और विश्वास का माहौल मजबूत कर रही है।
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