देश में प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागने की पुलिसिया कार्रवाई पर शीर्ष अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए पूछा है कि क्या यह कोई युद्ध क्षेत्र है।
लोकतांत्रिक अधिकारों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाल ही में हुए नागरिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग के मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने तल्ख टिप्पणी की है। वॉइस ऑफ मैनपुरी के अनुसार, अदालत ने साफ तौर पर कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। पुलिस प्रदर्शनकारियों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकती जैसा सीमाओं पर दुश्मनों के साथ किया जाता है।
कोर्ट ने पुलिस प्रशासन से पूछे ये तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली और भीड़ नियंत्रण के तरीकों पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- क्या यह कोई युद्ध क्षेत्र है: पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए युद्ध जैसे हालात क्यों पैदा किए?
- अत्यधिक बल प्रयोग: पानी की बौछारें और आंसू गैस के अनगिनत गोले दागने की अनुमति किसने दी?
- नियमों का उल्लंघन: क्या पुलिस बल प्रयोग करने से पहले निर्धारित गाइडलाइंस और एसओपी (SOP) का पालन कर रही थी?
इस मामले में कोर्ट ने संबंधित राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP) से स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचलने के लिए कानून का दुरुपयोग पाया गया, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस फैसले के बाद देश भर में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।
(Image Credit: abplive.com)






