लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बहुप्रतीक्षित जातीय जनगणना को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। यह पहली बार होगा जब राज्य में इतने व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत आधार पर जातिगत आंकड़े एकत्र किए जाएंगे। इस प्रक्रिया को भारत की आगामी जनगणना 2027 के साथ जोड़ा गया है, जिसकी रूपरेखा शीतल वर्मा (जनगणना निदेशक, उत्तर प्रदेश) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साझा की।
यह पहल न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जनगणना से राज्य की वास्तविक सामाजिक संरचना का स्पष्ट चित्र सामने आएगा।
दो चरणों में पूरी होगी जनगणना प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश में जनगणना 2027 को दो प्रमुख चरणों में पूरा किया जाएगा:
1. हाउस लिस्टिंग (House Listing Phase)
पहले चरण में घरों की सूची तैयार की जाएगी और बुनियादी सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी।
- अवधि: 7 मई से 21 मई
- मकानों का सूचीकरण
- घरों की स्थिति, सुविधाएं और संसाधनों का डेटा
इस चरण में “स्वगणना” (Self Enumeration) की सुविधा भी शुरू की जाएगी, जिसके तहत नागरिक स्वयं ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे।
2. जनसंख्या गणना (Population Enumeration Phase)
दूसरे चरण में व्यक्तिगत स्तर पर जानकारी जुटाई जाएगी, जिसमें जातिगत डेटा भी शामिल होगा।
- अवधि: 22 मई से 20 जून
- नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी
- पहली बार जाति आधारित डेटा संग्रह
यह चरण सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसी दौरान राज्य की जातीय संरचना के वास्तविक आंकड़े सामने आएंगे।
पहली बार जुटेंगे जातिगत आंकड़े
आजादी के बाद यह पहला अवसर होगा जब व्यक्तिगत स्तर पर जातिगत आंकड़े आधिकारिक रूप से एकत्र किए जाएंगे। इससे पहले जनगणना में जाति से संबंधित व्यापक डेटा संग्रह नहीं किया जाता था (SC/ST को छोड़कर)।
शीतल वर्मा के अनुसार, इस बार डेटा संग्रह पूरी तरह वैज्ञानिक और डिजिटल माध्यम से किया जाएगा, जिससे आंकड़ों की सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
डिजिटल जनगणना: तकनीक का बड़ा उपयोग
इस बार की जनगणना कई मायनों में खास है क्योंकि:
- पहली बार पूरी प्रक्रिया डिजिटल होगी
- नागरिक स्वयं ऑनलाइन डेटा भर सकेंगे
- मोबाइल और टैब आधारित डेटा एंट्री
- रियल टाइम मॉनिटरिंग
सरकार का उद्देश्य है कि तकनीक के जरिए पारदर्शिता बढ़ाई जाए और डेटा संग्रह की प्रक्रिया को तेज और त्रुटिहीन बनाया जाए।
गोपनीयता और डेटा सुरक्षा पर जोर
जातिगत डेटा संवेदनशील होने के कारण सरकार ने गोपनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही है।
- व्यक्तिगत जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रखी जाएगी
- डेटा का उपयोग केवल नीतिगत निर्णयों के लिए होगा
- किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी
यह आश्वासन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जातीय डेटा को लेकर समाज में संवेदनशीलता और राजनीतिक बहस दोनों मौजूद हैं।
SOP का इंतजार अभी बाकी
हालांकि तैयारियां तेज हैं, लेकिन अभी विस्तृत SOP (Standard Operating Procedure) जारी होना बाकी है।
इस SOP में यह स्पष्ट किया जाएगा कि:
- डेटा संग्रह की प्रक्रिया क्या होगी
- किन नियमों का पालन किया जाएगा
- किस प्रकार की जानकारी अनिवार्य होगी
केंद्र सरकार की नीतियों के अनुरूप ही पूरी जनगणना प्रक्रिया संचालित की जाएगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में पहली जनगणना 1872 में शुरू हुई थी। 2027 की जनगणना:
- देश की 16वीं जनगणना होगी
- आजादी के बाद 8वीं जनगणना होगी
उत्तर प्रदेश में इसको लेकर सभी जिलों में प्रशिक्षण कार्य पूरा कर लिया गया है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो।
सामाजिक और राजनीतिक महत्व
जातीय जनगणना का प्रभाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। इसके कई बड़े प्रभाव हो सकते हैं:
1. सामाजिक न्याय
- पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी
- योजनाओं का बेहतर लक्ष्य निर्धारण
2. राजनीतिक रणनीति
- पार्टियों को जातीय समीकरण समझने में मदद
- चुनावी रणनीतियों में बदलाव
3. नीति निर्माण
- आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं में सुधार
- संसाधनों का बेहतर वितरण
स्वगणना (Self Enumeration) का विकल्प
सरकार ने नागरिकों को जागरूक करते हुए स्वगणना का विकल्प भी दिया है। इसके तहत लोग स्वयं ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर अपनी जानकारी दर्ज कर सकते हैं।
इससे:
- समय की बचत होगी
- डेटा की सटीकता बढ़ेगी
- नागरिकों की भागीदारी बढ़ेगी
यह कदम डिजिटल इंडिया अभियान के तहत एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
प्रशासन और जनता की नजरें दूसरे चरण पर
हालांकि पहला चरण तकनीकी और बुनियादी है, लेकिन सभी की नजरें दूसरे चरण पर टिकी हैं, जहां जातिगत डेटा एकत्र किया जाएगा।
यह चरण:
- सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र देगा
- राजनीतिक बहस को नया आयाम देगा
- भविष्य की नीतियों की दिशा तय करेगा
उत्तर प्रदेश में जातीय जनगणना 2026-27 एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। यह न केवल डेटा संग्रह की प्रक्रिया है, बल्कि राज्य की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना को समझने का एक बड़ा माध्यम भी है।
शीतल वर्मा के नेतृत्व में यह प्रक्रिया तकनीक और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ रही है। अब देखना यह होगा कि इस जनगणना के आंकड़े राज्य और देश की नीतियों को किस दिशा में ले जाते हैं।



