बार-बार क्यों फेल हो रहा ISRO का PSLV रॉकेट? रिटायर्ड वैज्ञानिकों की टीम करेगी गहन जांच

बार-बार क्यों फेल हो रहा ISRO का PSLV रॉकेट?

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की रीढ़ माने जाने वाले PSLV रॉकेट की लगातार दो विफलताओं ने वैज्ञानिक समुदाय और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है। करीब तीन दशक तक विश्वसनीयता का प्रतीक रहे इस प्रक्षेपणयान के हालिया असफल मिशनों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच शुरू हो चुकी है, जिसके लिए इंटरनल टीम के साथ-साथ रिटायर्ड वैज्ञानिकों की एक विशेष समिति गठित की गई है।

12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 ने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरी; प्रक्षेपण के कुछ मिनट बाद मिशन पथ से विचलित हो गया।

‘वर्क हॉर्स’ PSLV पर क्यों उठे सवाल?

Indian Space Research Organisation (ISRO) का PSLV यानी Polar Satellite Launch Vehicle लंबे समय से छोटे और मध्यम वजन के उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के लिए सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाता रहा है। 32 वर्षों के इतिहास में इसकी सफलता दर बेहद प्रभावशाली रही है। लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि इसके दो मिशन लगातार विफल हुए हैं।

पिछले वर्ष 18 मई 2025 को PSLV-C61 के जरिए EOS-09 उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया था। यह सी-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार आधारित उपग्रह था, जिसका उद्देश्य सीमाओं की निगरानी और सामरिक मानचित्रण था। हालांकि प्रक्षेपण के लगभग 6 मिनट 20 सेकंड बाद रॉकेट अपने निर्धारित पथ से विचलित हो गया और मिशन असफल रहा।

इसके बाद 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 ने उड़ान भरी, लेकिन यह भी लगभग समान समय पर अपने मार्ग से भटक गया। इस मिशन में EOS N-1 (Anvesh) सहित 15 अन्य उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया जाना था। इन उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका।

रिटायर्ड वैज्ञानिकों की विशेष समिति क्यों बनी?

लगातार दो विफलताओं के बाद ISRO ने एक राष्ट्रीय स्तर की विशेषज्ञ समिति गठित की है। इस समिति में ISRO के पूर्व अध्यक्ष S. Somanath और प्रधानमंत्री के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार K. Vijay Raghavan को शामिल किया गया है।

सूत्रों के अनुसार, यह समिति केवल तकनीकी कारणों की जांच तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि “संगठनात्मक” पहलुओं की भी समीक्षा करेगी। यानी यह देखा जाएगा कि कहीं निर्णय प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण, सप्लाई चेन, निर्माण और असेंबली प्रक्रियाओं में कोई प्रणालीगत कमी तो नहीं है।

जांच के प्रमुख बिंदु

विशेषज्ञ समिति निम्न बिंदुओं पर चरणबद्ध तरीके से जांच करेगी:

  1. रॉकेट के विभिन्न चरणों (Stages) का प्रदर्शन

  2. तरल और ठोस ईंधन इंजन की कार्यप्रणाली

  3. मार्गदर्शन (Guidance) और नियंत्रण प्रणाली

  4. निर्माण और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain)

  5. इंटीग्रेशन और क्वालिटी एश्योरेंस प्रक्रिया

  6. जवाबदेही निर्धारण की प्रणाली

सूत्रों का कहना है कि समिति अप्रैल के पहले सप्ताह तक अपनी रिपोर्ट ISRO अध्यक्ष वी. नारायणन को सौंप सकती है।

संगठनात्मक कारणों की भी होगी समीक्षा

यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में कई निजी कंपनियां भी शामिल हैं। ऐसे में यदि निर्माण या गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया में कोई खामी पाई जाती है, तो उसका असर केवल PSLV तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अन्य प्रक्षेपण यानों पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञ समिति इस बात की भी समीक्षा करेगी कि क्या विफलताओं के पीछे किसी प्रकार की समन्वय कमी, निगरानी तंत्र की कमजोरी या निर्णय प्रक्रिया में देरी जिम्मेदार है।

सोमनाथ का अनुभव क्यों अहम?

S. Somanath रॉकेट प्रणाली के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वे देश के सबसे भारी प्रक्षेपणयान GSLV Mk III (अब LVM3) के परियोजना निदेशक रह चुके हैं। एक समय GSLV की लगातार विफलताओं के कारण उसे “नॉटी बॉय” तक कहा गया था, लेकिन सोमनाथ के नेतृत्व में वही रॉकेट आज ISRO का सबसे विश्वसनीय भारी प्रक्षेपणयान बन चुका है।

सोमनाथ को सिस्टम इंजीनियरिंग, संरचनात्मक डिजाइन, संरचनागत गतिकी, इंटीग्रेशन प्रक्रियाओं और पायरो तकनीक में गहरा अनुभव है। वर्ष 1985 में ISRO ज्वाइन करने के बाद वे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में PSLV विकास परियोजना से जुड़े रहे। ऐसे में PSLV की संरचना और विकास इतिहास की गहरी समझ उन्हें इस जांच के लिए उपयुक्त बनाती है।

क्या भविष्य के मिशन प्रभावित होंगे?

ISRO के सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल भविष्य के मिशनों को पूरी तरह स्थगित नहीं किया गया है, लेकिन अगला प्रक्षेपण फेलियर एनालिसिस रिपोर्ट के बाद ही तय होगा। इसका मतलब है कि लॉन्च शेड्यूल में देरी संभव है।

हालांकि, राहत की बात यह है कि विफलता के बावजूद ISRO के अन्य कार्यक्रम—जैसे संचार उपग्रह, नेविगेशन मिशन और चंद्रमा/सूर्य मिशन—पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। फिर भी यदि तीसरी बार भी ऐसी स्थिति बनती है, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की लॉन्च विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है।

क्यों अहम है यह जांच?

PSLV भारत की व्यावसायिक लॉन्च सेवाओं का भी प्रमुख माध्यम रहा है। कई विदेशी उपग्रहों को इसी रॉकेट के जरिए कक्षा में स्थापित किया गया है। लगातार विफलताएं न केवल तकनीकी बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव भी डाल सकती हैं।

इसलिए पहली बार इंटरनल कमेटी के साथ एक्सटर्नल विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है, ताकि निष्पक्ष और व्यापक समीक्षा हो सके। यह कदम बताता है कि ISRO इस संकट को केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार के अवसर के रूप में देख रहा है।

PSLV रॉकेट की लगातार दो विफलताओं ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि ISRO का ट्रैक रिकॉर्ड मजबूत रहा है, लेकिन हालिया घटनाओं ने आत्ममंथन की जरूरत को स्पष्ट कर दिया है।

पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ और डॉ. के. विजय राघवन की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट अब बेहद अहम मानी जा रही है। यह रिपोर्ट तय करेगी कि PSLV दोबारा अपनी “वर्क हॉर्स” की पहचान कायम कर पाएगा या नहीं।

आने वाले महीनों में इस जांच के निष्कर्ष न केवल PSLV बल्कि पूरे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की दिशा तय कर सकते हैं।

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