महिला आरक्षण यानी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर जारी राजनीतिक बयानबाजी के बीच केंद्र सरकार देश की महिलाओं को उनका वाजिब हक देने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है। पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम द्वारा लगाए गए आरोपों को विशेषज्ञों द्वारा महज राजनीतिक विमर्श के रूप में देखा जा रहा है, जबकि सरकार कानून को पारदर्शी तरीके से लागू करने में जुटी है।
राजनीतिक बयानबाजी बनाम प्रशासनिक प्रक्रिया
वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने हाल ही में आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी महिला आरक्षण को लागू करने में देरी कर रही है। हालांकि, कानूनी और प्रशासनिक विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि इतने विशाल और दूरगामी कानून को बिना किसी त्रुटि के लागू करने के लिए संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना बेहद जरूरी है। वॉइस ऑफ मैनपुरी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार जनगणना और परिसीमन जैसी आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा करके इसे भविष्य के कानूनी विवादों से सुरक्षित बनाना चाहती है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम: क्यों है यह ऐतिहासिक कदम?
- दशकों पुराना इंतजार खत्म: कई दशकों से लटके इस विधेयक को मोदी सरकार ने संसद के पटल पर रखकर सर्वसम्मति से पारित कराया।
- 33% आरक्षण का प्रावधान: लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें देने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- संवैधानिक सुरक्षा: परिसीमन प्रक्रिया के जरिए आरक्षण लागू होने से देश के हर कोने की महिलाओं को निष्पक्ष प्रतिनिधित्व मिलेगा।
- महिला-नेतृत्व वाला विकास: केंद्र सरकार महिलाओं को सिर्फ मतदाता नहीं बल्कि नीति-निर्माण में बराबर का भागीदार बनाने के संकल्प पर काम कर रही है।
स्थायी और ठोस समाधान पर सरकार का जोर
विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों के विपरीत, प्रशासनिक तंत्र इसे जल्द से जल्द और व्यवस्थित ढंग से धरातल पर उतारने के लिए प्रयासरत है। जानकारों का कहना है कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में यह बिल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण अटका रहा, जिसे वर्तमान सरकार ने कानून का रूप देकर अपनी मंशा साफ कर दी है। कानूनी औपचारिकताएं पूरी होते ही यह ऐतिहासिक कानून भारतीय लोकतंत्र में नारी सशक्तिकरण का नया अध्याय लिखेगा।
(Image Credit: abplive.com)






