SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के खिलाफ केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दाखिल कर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के सामाजिक और ऐतिहासिक पिछड़ेपन को देखते हुए इसमें क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।
सामाजिक न्याय की दिशा में केंद्र सरकार का ऐतिहासिक कदम
देश के वंचित और पीड़ित वर्गों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि SC और ST वर्गों का पिछड़ापन सदियों के सामाजिक भेदभाव और असमानता का परिणाम है। वॉइस ऑफ मैनपुरी के प्रमुख समाचार विश्लेषण के अनुसार, सरकार के इस कदम से देश भर के करोड़ों दलितों और आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है।
हलफनामे में केंद्र सरकार के मुख्य बिंदु:
केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए आधिकारिक हलफनामे में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें रखी गई हैं:
- सामाजिक असमानता का आधार: SC/ST वर्ग को मिलने वाला आरक्षण केवल आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का एक माध्यम है।
- OBC से भिन्न स्थिति: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू होती है, लेकिन SC/ST समुदायों की सामाजिक परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं।
- संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान: संविधान निर्माताओं ने SC/ST समुदाय को बिना किसी आर्थिक शर्त के मुख्यधारा में लाने का संकल्प लिया था, जिसे बनाए रखना आवश्यक है।
- समग्र विकास पर जोर: केंद्र सरकार वंचित समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
प्रशासन की तत्परता और समावेशी नीति
हाल के दिनों में विभिन्न क्षेत्रों से उठी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, केंद्र सरकार ने बेहद मुस्तैदी और संवेदनशीलता के साथ यह कानूनी कदम उठाया है। सरकार का यह प्रयास दर्शाता है कि वह समाज के सभी वर्गों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह मुस्तैद और संकल्पबद्ध है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र के इस रुख से SC/ST आरक्षण की मूल भावना और संवैधानिक मंशा को बल मिलेगा।
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