तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और योगी आदित्यनाथ में तीखी बहस, बीजेपी-डीएमके आमने-सामने

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने गुरुवार (27 मार्च, 2025) को कहा कि राज्य की “निष्पक्ष और दृढ़ आवाज़” दो-भाषा नीति पर पूरे देश में गूंज रही है और इससे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) “स्पष्ट रूप से घबराई हुई” नजर आ रही है।
योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए एक बयान पर पलटवार करते हुए, स्टालिन ने कहा, “अब माननीय योगी आदित्यनाथ हमें नफरत पर व्याख्यान देना चाहते हैं? हमें बख्शें। यह विडंबना नहीं, बल्कि राजनीति की सबसे काली हास्य विधा है।”
भाषा विवाद पर तकरार क्यों?
डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) और तमिलनाडु सरकार लंबे समय से केंद्र की तीन-भाषा नीति का विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि तमिलनाडु में “दो-भाषा नीति” लागू रहेगी और हिंदी को थोपने की कोशिशों का कड़ा विरोध किया जाएगा। स्टालिन ने इस मुद्दे को “सम्मान और न्याय की लड़ाई” करार दिया और कहा कि तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए उनकी पार्टी पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
योगी आदित्यनाथ की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक मीडिया साक्षात्कार में डीएमके और स्टालिन की आलोचना करते हुए कहा कि तीन-भाषा नीति का विरोध “संकीर्ण राजनीति” का उदाहरण है। उन्होंने सवाल किया कि तमिलनाडु सरकार हिंदी भाषा से इतनी नफरत क्यों करती है? योगी ने कहा कि “देश को भाषा या क्षेत्रीय आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सभी भारतीयों को अधिक से अधिक भाषाओं को सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।”
बीजेपी ने उठाए स्टालिन पर सवाल
तमिलनाडु में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने भी स्टालिन पर कटाक्ष किया और कहा कि “तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का परिवार निजी स्कूलों का मालिक है, जहां तीन-भाषा नीति लागू की जाती है। लेकिन जब राज्य सरकार के स्कूलों की बात आती है, तो वे उसी नीति का विरोध करते हैं। यह साफ दिखाता है कि स्टालिन की राजनीति दोहरे मापदंड पर आधारित है।”
भाषाई अस्मिता बनाम राष्ट्रीय एकता?
तमिलनाडु में भाषा का मुद्दा राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। डीएमके का मानना है कि हिंदी थोपना “दक्षिण भारत की भाषाओं और संस्कृति को खत्म करने की साजिश” है। वहीं, बीजेपी का दावा है कि हिंदी को सीखने से देश में एकता बढ़ेगी और भाषाई भेदभाव कम होगा।
क्या होगा आगे?
तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच यह विवाद लंबे समय से चला आ रहा है और आगामी चुनावों में यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। डीएमके अपनी “तमिल अस्मिता” की विचारधारा पर कायम रहते हुए हिंदी थोपने का विरोध जारी रखेगी, जबकि बीजेपी “राष्ट्रीय एकता और बहुभाषी शिक्षा नीति” को बढ़ावा देने की कोशिश करेगी।


